
यह राजस्थान प्रान्त के जिला श्रीगंगानगर की रायसिंहनगर तहसील के गांव डाबला के कोई एक किलोमीटर की दूरी पर करनी ही नहर के किनारे पर स्थित है।
शहीद नगर गुरूद्वारा बुढ़ा जोडह के साथ सिख इतिहास का सम्बध 17 वीं शताब्दी की शुरूआत में जुड़ता है। बुढ़ा जोहड़ का अर्थ है पुराना छप्पड़ यहां 80 मुरब्बे नीची जगह है जहां बरसात के मौसम मे कई मीलों तक का पानी नीचे की तरफ चलता हुआ इक्टृठा हो जाता था।
बाबा बंदा सिंह बहादुर की शहादत के बाद मुगल हुकूमत ने पंजाब के सिक्खों पर जुल्म जबर की हद कर दी फर्खुसिअर बादशाह ने हुकूम जारी किया कि जहां पर कोई सिख मिले उसे कत्ल कर दों। सिखों के सिरां की कीमत डलने लगी ।उस जुल्म जबर के दौर में हुकूमत ने सिखों को पंजाब से अपने घर बार छोड़कर दूर दराज के इलाकों पर जाने के लिए मजबूर कर दिया।
सन् 1731 ई.में नादर शाह ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया यहां से बेशुमार दौलत लूटी और पंजाब से होते हुए अफगानिस्तान को लौट रहा था सिखां ने उस के काफिले पर हमले करके बहुत माल और बहुत सारी नौजवान लड़कियों को उनके काफिलों से मुक्त करवाकर उनके घर वापस पहुंचाया। नादरशाह इस बात से बहुत क्रोधित हुआ और जकारिया खांन को सिखों का नामो निशान मिटाने का हुकम दिया सिखों के विरूद्व लाहौर से जकरिया खान ने फौज भेजी माझे से नवाब जकरिया के सताए हुए दुआबे से आदिना बेग फौजदार जालंधर मालवे से सूबा सरहद के जुल्मो का शिकार हुए सिख विपदा के समय अपने घर बार छोड़ के राजस्थान के बीकानेर रियासत के मरूस्थल वीरान जंगल में आ गए इस जगह पर पानी काफी तादाद में था यहां पर ही डेरे लगा लिए क्यूंकि जकरिया खान ने सिखों के खात्मे के लिए अमतृसर के चौधरियों और सरकारी मुखबिरों को सिखों के विरूद्व पूरी तरह तैयार किया हुआ था जंडयाले गुरू के हरी भगत निंरजनियों मंडियाली का मस्सा रंगड़,करमा,छिना,रामा,रंधावा,नौशहरे वाले जोध नगरिया मजिठा के चौधरियों नेइस काम में सरकार की पूरी पूरी सहायता की।
इतिहास में जिक्र मिलता है कि ये दोनो सूरमें बुढ़ा जौहड़ से चलकर श्री दमदमा साहिब तलवंडी साहिब पहूंचे और अपनी सफलता की अरदास के लिए दमदमा साहिब में हाजिर हुए तो उस समय दशम पातशाह की बाणी के बारे में विवाद चल रहा था । सिखां का एक समूह दशम पातशाह की बाणी को अलग अलग पोथियां में ही रहने देना चाहता था सुखा सिंह महिताब सिंह की अरदास के समय इस विवाद का फैसला यह हुआ कि अगर भाई सुखा सिंह महिताब सिंह दुष्ट मस्सा रंगड़ का सिर काट कर उसका कटा हुआ सिर लेकर सही सलामत बुढ़ा जोहड़ वापिस पहूंच जाते है तो दशम पातशाह की सारी बाणी एक जिल्द में एकत्रित कर दशम ग्रन्थ का स्वरूप तैयार किया जायेगा अगर वो इस काम में सफल ना हो सके तो दशम पातशाह की बानी अलग अलग पोंथियों में ही रहने दी जाएगी गुरू की मेहर का सदका भाई महताब सिंह और सुखा सिंह अपने उदे्दश्य में सफल हो गए मस्सा रंगड़ का सिर काट कर बुढ़ा जोहड़ लाया गया इस तरह दशम पातशाह की बाणी के बारे में छिडे़ विवाद का अंत हुआ।
भाई सुखा सिंह महिताब सिंह ने तरनतारन के नजदीक पहूंचकर गांव के चौधरियों का भेष बना कर अपने गांव का मामला भरने के बहाने ठीकरियों की थैलियों भर ली जब दोनों सिख अमृतसर पहूंचे तो पहले तैयार योजना अनुसार उन्होने अपने घोडे़ अकाल बुगें के सामने ईलायची बेरी से बांध दिए और अरदास कर के दोनों सूरमे हरमंदिर साहिब पहूंचे तो मस्सा रंगड़ अपनी लुच्च मंण्डली के साथ हरमंदिर साहिबमें खाट पर बैठा हुक्का पी रहा था कन्जरिया नाच रही थी और शराब के दौर चल रहे थें जब उस को कहा गया कि चौधरी मामला भरने आये है। तो उन्हे थैलिया पेश करने का हुक्म दिया थैलिया पेश होने पर मस्सा रंगड़ उठ कर उन्हे देखने लगा तो भाई महिताब साहिब सिंह ने फुर्ती से अपने श्री साहिब का वार कर उस का सर धड़ से अलग कर दिया सुखा सिंह ने पलक झपकते ही मस्सा रंगड़ के कटे सर को अपने भाले पर टांग दिया और वंहा अफरा तफरी मच गयी वहां इक्ठा सारी लुच्च मंडली भाग गई दोनों सूरमें भाले पर टंगे सिर को लेकर फुर्ती से अपने अपने घोड़ो पर सवार होकर अमृतसर की सीमा को पार गए ये दोनों सूरमे अपनी की हुई अरदास को पूरा करते हूए वापिस बुढ़ा जोहड़ को चल दिए रात हनुमानगढ़ शहर के पास काटी यहां स ेचल कर सुखा सिंह महिताब सिंह बुढ़ा जोहड़ बाबा बुढ़ा सिंह के जत्थों के सिखों के पास आ पहूंचे और मस्सा रंगड़ का कटा हुआ सिर वहां एकत्रित खालसा दल के दीवान में पेश किया इस कार्य की सफलता के लिए शुक्राने की अरदास की गई।
शहीद नगर गुरूद्वारा साहिब बुढ़ा जोहड़ की नीव सन्1953 में सत फतह सिंह जी द्वारा रखी गई कुछ कच्चे मकान ओर पानी की डिग्गी 1954 में बनायी गई गुरूद्वारे और लंगर का खर्चौ चलाने के लिए 2 मुरब्बे जमीन खरीदी गई।
शहीद नगर गुरूद्वारा साहिब बुढ़ा जोहड़ में दो विधालय चल रहे है एक सुखा सिंह भाई महिताब सिंह अनाथ विधालय है जिस में करीब एक सौ बच्चे है। जिनकेरहने के लिए लंगर पानी साबुन तेल आदि का खर्चै लिखाई ,पढ़ाई का खर्चै शहीद नगर गुरूद्वारा साहिब बुढ़ा जोहड़ ट्रस्ट द्वारा किया जाता है इसके अलावा एक सिख मिशनरी कॉलेज भी चल रहा है जिस में करीब 90 विधार्थी हैं। जिनको संगीत विधा दी जाती है।गुरूद्वारा ट्रस्ट की तरफ से विधार्थियों की और प्रोफेसरों के रहने खाने लंगर आदि की व्यवस्था की जाती है।कॉलेज और अनाथ विधालय के बच्चां को वजीफा दिया जाता है।स्कूल और कॉलेज के किसी बच्चें से किसी प्रकार का कोई चार्ज नही लिया जाता है। सब कुछ निःशुल्क है और वजीफा अलग से दिया जाता है।इस स्कूल और कॉलेज के सैकड़ो बच्चें देश विदेश में ग्रन्थी और रागी की भूमिका निभा रहे है।
